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शादी से मुकरना हमेशा 'रेप या धोखाधड़ी' नहीं-इलाहाबाद हाईकोर्ट

 शादी से मुकरना हमेशा 'रेप या धोखाधड़ी' नहीं; लंबे समय के आपसी संबंध स्वैच्छिक: इलाहाबाद हाईकोर्ट

अदालत ने कहा- ब्रेकअप के वक्त जाति का हवाला


देना SC/ST एक्ट का अपराध नहीं; नए कानून (BNS) को पिछली तारीखों से लागू नहीं किया जा सकता; संत कबीर नगर की विशेष अदालत का आदेश रद्द।

वरिष्ठ फौजदारी अधिवक्ता अमित कुमार उपाध्याय की सशक्त पैरवी

संत कबीर नगर

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने वयस्क और शिक्षित स्त्री-पुरुष के बीच आपसी सहमति से बने संबंधों को लेकर एक बड़ा और महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत प्रतिपादित किया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि दो बालिग व्यक्ति लंबे समय तक स्वेच्छा से प्रेम संबंध में रहते हैं और बाद में सामाजिक, जातिगत या पारिवारिक कारणों से शादी नहीं हो पाती, तो इसे 'शादी का झूठा वादा' मानकर बलात्कार या धोखाधड़ी की श्रेणी में नहीं डाला जा सकता। जब तक यह साबित न हो कि पुरुष की मंशा शुरुआत से ही केवल शारीरिक शोषण की और धोखा देने की थी, तब तक इसे केवल वादे से मुकरना माना जाएगा, न कि आपराधिक कृत्य।

क्या था मामला?

यह मामला संत कबीर नगर जिले के बखीरा थाने से जुड़ा है, जहाँ पीड़ित युवती ने पवन कुमार पांडेय नामक युवक के खिलाफ मुकदमा (Case Crime No. 374 of 2025) दिनांक 07/10/2025 को दर्ज कराया था। आरोप था कि दोनों के बीच पिछले 4-5 वर्षों से प्रेम संबंध थे। इस दौरान आरोपी ने शादी का झांसा देकर कई बार शारीरिक संबंध बनाए और ₹80,000 भी लिए। बाद में जब युवती ने शादी का दबाव बनाया, तो युवक ने जातिगत भिन्नता और परिवार की असहमति का हवाला देकर शादी करने से इनकार कर दिया। इस मामले में जिला स्तर पर विशेष अदालत (SC/ST Act) ने 6 दिसंबर 2025 को आरोपी के खिलाफ संज्ञान लेते हुए समन जारी किया था, जिसे चुनौती देते हुए आरोपी ने हाईकोर्ट में आपराधिक अपील दाखिल की थी।

 *वरिष्ठ फौजदारी अधिवक्ता अमित कुमार उपाध्याय की सशक्त पैरवी*

मामले की पृष्ठभूमि में यह उल्लेखनीय है कि जब यह मुकदमा संत कबीर नगर की जिला अदालत में चल रहा था, तब **बचाव पक्ष (अभियुक्त पवन कुमार पांडेय) की ओर से वहां के वरिष्ठ फौजदारी अधिवक्ता अमित कुमार उपाध्याय* पैरवी कर रहे थे। अधिवक्ता अमित कुमार उपाध्याय ने जिला स्तर पर ही इस मामले के सभी बारीक कानूनी पहलुओं, जैसे दोनों पक्षों का वयस्क होना, लंबे समय का सहमतिजन्य रिश्ता और नए कानून की तकनीकी खामियों को बेहद मजबूती से अदालत के सामने रखा था। हाईकोर्ट में मामले की पैरवी शशिधर शुक्ला ने किया।

 हाईकोर्ट की तीन बेहद महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणियां:

1. लंबे समय का संबंध स्वैच्छिक और सहमतिजन्य

न्यायामूर्ति मदन पाल सिंह की एकलपीठ ने मामले के तथ्यों का अवलोकन करते हुए कहा कि पीड़िता एक 24 वर्षीय शिक्षित और वयस्क महिला है。 वह पिछले 4 से 5 साल से आरोपी के साथ प्रेम संबंध में थी और इस दौरान उसने कभी कोई विरोध नहीं किया। इतने लंबे समय तक बिना किसी आपत्ति के रहा गया रिश्ता पूरी तरह स्वैच्छिक था। बाद में परिस्थितियों या पारिवारिक विरोध के कारण शादी न हो पाने को भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 के तहत अपराध नहीं माना जा सकता।

2. नया कानून (BNS) पिछली तारीखों से लागू नहीं हो सकता

अदालत ने एक ऐतिहासिक कानूनी बिंदु को रेखांकित करते हुए कहा कि पीड़िता के अनुसार यह संबंध 2020 से 2025 के बीच का है। देश में भारतीय न्याय संहिता (BNS) 1 जुलाई 2024 से प्रभावी हुई है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आपराधिक कानून हमेशा भविष्यदर्शी होते हैं, उन्हें पिछली तारीखों से लागू नहीं किया जा सकता। इसलिए, 2024 से पहले की घटनाओं पर बीएनएस की धारा 69 के तहत मुकदमा चलाना कानूनन गलत है।

3. जाति का संदर्भ देना SC/ST एक्ट का उल्लंघन नहीं:

अदालत ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के आरोपों को भी खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि एफआईआर या बयानों में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जो यह दर्शाए कि आरोपी ने सार्वजनिक रूप से पीड़िता को अपमानित करने के इरादे से कोई जातिसूचक टिप्पणी की हो। ब्रेकअप या शादी से इनकार करते समय महज सामाजिक और जातिगत भिन्नता का जिक्र करना इस कठोर अधिनियम की धाराओं को आकर्षित नहीं करता।

सुप्रीम कोर्ट के नजीरों का हवाला देकर पूरी कार्यवाही रद्द

उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक निर्णयों—प्रमोद सूर्यभान पवार बनाम महाराष्ट्र राज्य, *दीपक गुलाटी बनाम हरियाणा राज्य* और *महेश दामू खरे बनाम महाराष्ट्र राज्य*—का हवाला दिया। इन नजीरों के आधार पर कोर्ट ने माना कि आरोपी पवन कुमार पांडेय के खिलाफ इस आपराधिक कार्यवाही को जारी रखना कानून की प्रक्रिया का सरासर दुरुपयोग होगा।

इसके साथ ही माननीय उच्च न्यायालय ने विशेष न्यायाधीश (SC/ST Act), संत कबीर नगर द्वारा जारी संज्ञान व समन आदेश को पूरी तरह से विखंडित (Quash) करते हुए आरोपी की अपील को स्वीकार कर लिया और उसे मामले से बरी कर दिया।

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